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Sunday, September 13, 2009

नाच अंगुली, नाच......

नाच अंगुली, नाच !
विचारों की ताल पर, अभिव्यक्ति की लय पर
थिरक-थिरक ....नाच !!

पहले कागज़ पर चलती थी कलम ।
दो अंगुलियाँ और एक अंगूठा मिल कर पकड़ते थे जिसे ।
शेष दो अंगुलियाँ सहारा देती थीं जिनको ।
पूरा हाथ चलता था कलम के साथ !

आज 'की-बोर्ड' पर चलती हैं अंगुलियाँ ।
सारी अलग-अलग ।
सबने बाँट रखे हैं अपने-अपने अक्षर ।
और अंगूठा बढ़ा रहा दूरी,.... दे रहा 'स्पेस' !

चाहे नाचो अलग-अलग, चाहे थिरको अलग-अलग,
लेकिन शब्दों को बंटने ना देना, वाक्य को टूटने ना देना,
एकता की शक्ति पर,
विचारों और अभिव्यक्ति पर
आने ना पाए आंच,
नाच अंगुली, नाच .............!

Friday, September 11, 2009

समझदार को...............

"समझदार को इशारा ही काफ़ी है ।"
मैं नहीं जानता यह सबसे पहले किसने कहा ।
जिसने भी कहा, सोच-समझ कर ही कहा होगा ।
मुझे आज तक यह बात समझ में नही आयी ।
अरे भई, एक बात बताओ-
"समझदार ही होता , तो इशारे की भी ज़रूरत पड़ती ?"

Thursday, September 10, 2009

तारीख

ईश्वर ने दिन बनाए ।
इंसान ने हर दिन को एक अंक दे दिया ....... दिनांक !
ईश्वर का बनाया हर दिन एक नया चेहरा लगा कर आता है......
अंकों का चेहरा ! इंसान का दिया चेहरा !!
हम हर दिन को इंसान के दिए हुए चेहरे से पहचानते हैं ।
तारीख !
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तारीख से हर इंसान जुड़ा है ।
ज़्यादातर इंसान तारीख पर याद किये जाते हैं- अरे ! आज तो उसकी वर्षगाँठ है !
कुछ तारीखें इंसान की वजह से याद रखीं जाती हैं ।
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तारीखों और इंसान का रिश्ता यूँ ही बना रहेगा,
जब तक इंसान है !
जब तक तारीख है ।

Wednesday, September 9, 2009

असली रंग

चौराहे पर लाल बत्ती हो चुकी थी और बीचों-बीच ट्रेफिक पुलिस वाला खड़ा था ।
मैंने अपना स्कूटर रोका
स्कूटर लाल बत्ती को देख कर रोका, या पुलिस वाले को,... यह बताना मुश्किल है ।
...................

इधर-उधर देखा...होर्डिंग, दुकानें, आगे खड़ी कार पर कपड़ा मार कर पैसे मांगता लड़का..... ।
दाहिने नज़र पड़ी.....डिवाईडर के बीच लगे पौधों के ऊपर वाले पत्ते हरे , ....और नीचे के पत्ते लाल !
आश्चर्य हुआ, सब एक ही तरह के पौधों के पत्तों का रंग अलग-अलग !!!!
कहीं पौधे नकली तो नहीं ?!?
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ध्यान से देखा, पौधे नकली नहीं थे, उनके नीचे वाले पत्तों का रंग पान और गुटखों की पीक के कारण लाल था ।
लगा, "यही तो हमारे सुसभ्य चेहरे का असली रंग है !"

Monday, September 7, 2009

श्राद्ध ? !!!

दादाजी खिचड़ी खाते थे,
क्योंकि उनके दांत नही थे...
किसको परवाह, किसको फुर्सत,
कौन बत्तीसी लगवाता.....!

उनके श्राद्ध पर छत की मुंडेर पे
काला कौवा आता है,
बड़े मज़े से खीर खाता,
दादा तक है पहुंचाता...............!

Sunday, September 6, 2009

प्रणाम गुरूजी

" स्स ..............आ................लों" ने कल मेरी ब्रॉड बैंड लाइन दुरुस्त कर दी होती, तो मैं अपने समस्त गुरुओं
को "शिक्षक दिवस" पर प्रणाम तो कर लेता !

मेरी शुरू की भाषा पर एतराज़ तो नहीं न आपको ?
ये भाषा दुनिया ने सिखाई है ।
दुनिया तो सबसे बड़ी "गुरु" है भाई !

प्रणाम गुरूजी !

पहले कुल्ला कर लूँ भई......!

कहते हैं , जब खाने में कुछ कड़वा आ जाए , तो बोलने की बजाय पहले कुल्ला कर लेना चाहिए ।
'सब से तेज़' का दावा करने वाले ब्रॉड बैंड ने पूरे दस दिनों तक मेरा बैंड बजाये रखा ।
शिकायत दर्ज करने वाले कॉल सेंटर से ले कर विभाग के उच्च अधिकारी सब
एक दूसरे के पाले में फुटबाल फेंकते रहे , किसी के पास कोई जवाब नहीं था, कि हुआ क्या है ।
प्रेस का हवाला देने के बाद ये हाल है !
सच है,"सारी दुनिया इसलिए चल पा रही है, कि कुछ गिने-चुने काबिल लोग पूरी ईमानदारी से अपना काम
कर रहे हैं ।"
कड़वा लगा ना ?
इसीलिए कह रहा था, " पहले कुल्ला कर लूँ भई...! "

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